आज कई बरस बाद उसके शहर ,
उसकी गली से गुज़रा ।
जाके उसके मकां पे ठहरा।
देख कर चेहरे पे मुस्कान ज़रा सा।
उसे लगा कि ...
मुझे आज भी उससे मोहब्बत है।
ये तुम्हारा भ्रम है
मेरे मासूम से दिल मे ,
थोड़ी सी भी जगह पा सको,
अब इस काबिल नही हो तुम।
मेरे गीतों में ,ग़ज़लों में
कत्थई आंखों का ज़िक्र।
बेअदब ,बिखरे जुल्फों की फ़िक्र।
वो समझ बैठे की उनकी बेवफाई ने
हमे शायर बना दिया।
ये तुम्हारा भ्रम है
मेरे गीत ग़ज़लों में
एक शब्द की भी जगह पा सको
अब इस काबिल नही हो तुम।
लोगो की जुबां पर सुनकर
मेरी शोहरतें ,मेरी मिल्कियते।
मेरी बेफ़िक्री, मेरी आतुर मरहमते
मेरी मासूमियते,नज़ाफ़ते,मेरी रफअते।
फिर से चाह मुझे पाने की
वो समझ बैठी आज भी उसके इज़हार ने
हमे दीवाना बना दिया है।
ये तुम्हारा भ्रम है
मेरे पास बैठ कर
मुझसे दो शब्द बात भी कर सको
अब मेरे इस काबिल नही हो तुम।
@अशोक सिंह 'अश्क़'
शब्दार्थ
मिल्कियत-धन संपदा
मरहमते-दया
नज़ाफ़त-पवित्रता
रफअते-बुलंदी
