सुनो...
क्या तुम ठीक हो ?
सच सच बताओ...
लगता तो नही कि तुम ठीक है,
लगता तो ऐसा है जैसे कुछ कहना चाहती हो।
लेकिन कह नही पा रही हो
क्या हो गया है तुम्हें
क्या कहा...
अपनो से बोल नही पाते
ये कैसा बोझ है
अपनो से क्या शर्माना
एक कदम आगे तो बढ़ाओ
क्या...नही होता ?
होता क्यों नही है
तुमसे नही होता तो घुट क्यों रही हो
क्या बस यही समाधान है
यही तुम्हारे संस्कार है
अरे ! कुछ कहो तो सही है
क्या बिना फंदा मरना चाहती हो
ज़रा तेज़ बोलो
क्या ...क्या कहा ?
शायद तुमने हां कहा है।
अगर हां...
तब तुमसे अच्छा तो वो शराबी है
जो पीकर ही सही
भड़ास तो निकाल ही देता है
कुछ न कहने से अच्छा ...
बोलता तो है
तुम जैसे...
नीरस तो नही है।
©सचिन कुमार
काशी हिंदू विश्वविद्यालय
वाराणसी उ0प्र0
@editor -अशोक सिंह 'अश्क़'

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