बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

होलिकोत्सव



               होलिकोत्सव

अहहा... फागुन के क्या गजब नज़ारे है
बुआ मौसी चाचा चाची सब घर पधारे है

खेतो से गुज़रो गेहूं धान की झूमती बाली है
लजाती अलसी ,खनखनाते सरसो नाचे अरहर की डाली है

आंगन ,दुआर और दीवाल कोई क्या..रंगने लीपने से खाली है
दुःखो की दुश्वारी है और खुशी की फिर से हुई बहाली है

शाम क्या हुई...सब घर से निकले है
होलिका संग्रह के लिए खुद से भी झगड़े है

होलिका दहन के साथ बैर को जलाने की खुशी 
चेहरे पर छलकी है
सबके नज़रे में मुस्कान अभी ज़रा हल्की हल्की है

बाज़ारो में सजी रंग गुलाल और पिचकारी की दुकाने क्या ज़ोर भाती है
उनके आंखों की मस्तियाँ और गुस्ताखियां भी इस ओर आती है

थालियों में पडी बर्फियाँ पेडो से झगड़ रही है
गुच्छियां भी ये देख के मुस्कुरा पड़ी है

मुँह की मिठास अभी अधूरी है
पर सामने पुड़िया पूरी है

सुबह से बच्चे युवा बुड्ढ़े रंगों से रंगे है
कुछ के चेहरे लाल ,कुछ के पीले और कुछ के हरे है

अरे होली है !...नई दुल्हन भी कहाँ... लजाती है
कभी हमारा हाथ उनके गलो पर , कभी हमारे गलो तक अपना हाथ वो लाती है

रंग गुलाल जमीं से आसमां तक उड़े है
फगुवा बहार भी हर के ओठ पर सजे है

कोई झूमकर भांग के नशे में इस कदर झूमे है
की कभी गगन को ,तो कभी  धरा को चूमे है

आज किसी को पहचान जाओ तो गनीमत है
खोजो जिसे वो मिल जाये तो सही...न मिले तो हमारी ही तोहमत है

चेहरे और दीवारों पर मजहबी रंगों की न बंदिशे है
हर रंग में रंगने की हर जन की ख्वाहिशे है

होली की अदाएं  नाज़कते  हमे क्या खूब भाती है
चेहरे क्या हर रंगी दीवारे आज खूब इठलाती है।

आओ !होली के रंगों संग गिले शिकवों को भुला देते है
होलिकोत्सव की बधाई गले मिल के लेते है।

®अशोक सिंह 'अश्क़'









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