रविवार, 17 दिसंबर 2017
शनिवार, 16 दिसंबर 2017
mai peeda ka rajkumar...
मैं पीडा का राज कुंवर हूँ, तुम शहजादी रूपनगर की,
हो भी गया प्रेम हममें तो बोलो, मिलन कहाँ पर होगा |
मेरा कुरता सिला दुखों ने, बदनामी ने काज निकाले,
तुम जो आँचल ओढे उसमे, अम्बर ने खुद जड़े सितारे |
मैं केवल पानी ही पानी, तुम केवल मदिरा ही मदिरा,
मिट भी गया भेद तन का तो, मन का हवन कहाँ पर होगा |
मैं जन्मा इसलिए कि थोडी उम्र आंसुओं की बढ़ जाए,
तुम आई इस हेतु कि मेंहदी, रोज नए कंगन बनवाए,
तुम उदयाचल, मैं अस्ताचल, तुम सुखांत की मैं दुखांत की,
मिल भी गए अंक अपने तो रस अवतरण कहाँ पर होगा |
मीलों जहाँ न पता खुशी का, मैं उस आंगन का इकलौता,
तुम उस घर की कली जहाँ, नित होंठ करे गीतों का न्यौता |
मेरी उम्र अमावस काली और तुम्हारी पूनम गोरी,
मिल भी गई राशि अपनी तो बोलो लगन कहाँ पर होगा |
इतना दानी नही समय कि, हर गमले मे फूल खिला दे,
इतनी भावुक नही जिंदगी, हर ख़त का उत्तर भिजवा दे |
मिलना अपना सरल नही पर, फिर भी यह सोचा करता हूँ,
जब न आदमी प्यार करेगा, जाने भुवन कहाँ पर होगा
हो भी गया प्रेम हम मे तो बोलो, मिलन कहाँ पर होगा |
गोपालदास नीरज
गुरुवार, 7 दिसंबर 2017
gazal~0.45
मुलाकात
बिन तारे बिन जुगुनू रात,...रात नही होती।
गुजरती है वो मेरी गली से, बस मुलाकात नही होती।
मुनव्वर है चांद आसमा में, खुश है चांदनी
बुला लेता उसे गुफ्तगू के लिए ,बस उससे मसाफ़ात नही होती।
शर्माना ,गर्दन झुकाके चलना इसे मोहज्ज्ब समझती है वो
उसे नही पता क्या...बिना नज़र मिलाये इख़्तलात नही होती।
कुछ दिनो से इन दरख्तों में ,परिंदों को नही देखा
पूछा तो पता चला ,इनके पत्तो में आपस मे बात नही होती।
इंतज़ार में उसके ...चराग़ जलते रहे रात भर
ख्वाबो में वो साथ रहती है, हकीकत में साथ नही होती।
अवसाद हो या उन्माद ...देखता हूं उसे तो मुस्कुरा देता हूं
एक वो है जो कहती है इश्क़ में तुम जीत गए,मेरी मात नही होती।
चांद भी कायल है मेरी मोहब्बत पर ,चला आता है मोहब्बत की परिभाषा पूछने
उसे क्या पता मेरी अपने चांद से मुलाकात नही होती।
~~~अशोक सिंहअश्क़' '
शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017
ग़ज़ल ~1.0
खेला हूं यहां मै, तितलियों (भौरों/फूलो) के संग।
झगड़े भी हुए है, शूलो फूलो के संग।
फिर भी सब भूलाकर गले मिल रहे है हम
आम और बबूलों के संग।
अपनो के बिना ज़िन्दगी वीरान सी लगती है
ये मैने सिख लिया शहर से दूर ,रहकर गुलो के संग।
लौट के आया हूँ अपनी ज़िंदगी के पास
छोड़के अपने अहम को, अपने वसूलों के संग।
फिर जमेगी महफ़िल चबूतरे में , बाग़ बगीचों में
फिर होगी संग मस्ती ,सावन में झूलो के संग।
अब नही होगे अकेले ,सुनसान रास्तो में भी
दोस्तो को साथ लेके, दो-दो हांथ करके अब मंज़िलो के संग।
~~~अशोक सिंह 'अश्क़'
मंगलवार, 28 नवंबर 2017
ग़ज़ल ~ दोस्ती जहाँ है
ग़ज़ल ~ दोस्ती जहाँ है
खेला हूं यहां मै, तितलियों (भौरों/फूलो) के संग।
झगड़े भी हुए है, शूलो फूलो के संग।
फिर भी सब भूलाकर गले मिल रहे है हम
आम और बबूलों के संग।
अपनो के बिना ज़िन्दगी वीरान सी लगती है
ये मैने सिख लिया शहर से दूर ,रहकर गुलो के संग।
लौट के आया हूँ अपनी ज़िंदगी के पास
छोड़के अपने अहम को, अपने वसूलों के संग।
फिर जमेगी महफ़िल चबूतरे में , बाग़ बगीचों में
फिर होगी संग मस्ती ,सावन में झूलो के संग।
अब नही होगे अकेले ,सुनसान रास्तो में भी
दोस्तो को साथ लेके, दो-दो हांथ करके अब मंज़िलो के संग।
~~~अशोक सिंह 'अश्क़'
शुक्रवार, 24 नवंबर 2017
gazal ~0.75 तुझे अपने पास रक्खा है
तुझे अपने पास रक्खा है
खत लिखे, चिठ्ठियां लिखी,कुछ भेज दिए..कुछ को पास रक्खा है।
ये सिर्फ खत नही,इनमे यादो के जल को सुलझा के रक्खा है।
इनमे रूप -रंग -अक्स-नक्श सब का सब वैसा है
जैसा तुमने अपने पास रक्खा है।
कहा था लाऊंगा ...चांद तारे चांदनी जुगुनू गगन से
देख आज सबको छाजन पे बुला के रक्खा है।
हवा तेरी जुल्फों से,धूप तेरे चेहरे से ...खेल रही है
सिर्फ हमे... तुमने ,चुपचाप बिठा के रक्खा है।
इस दीवाने शहर में,तू इश्क़ है हर किसी का
हमने अपनी मोहब्बत को शहर से छुपा के रक्खा है।
सूरज चांद तारे और ये शमा सब के सब तेरे दीवाने बन बैठे
तेरी झलक की खातिर इन्होंने पहरा लगा के रक्खा है।
देख के इनकी मोहब्बत ,तेरे लिए
इश्क़ -ऐ-बयां को शौक -ऐ-जहां में दबा के रक्खा है।
~~~अशोक सिंह'अश्क़'
गुरुवार, 23 नवंबर 2017
अश्क़ शहर
ये अनजान शहर भी कितना अजीब है
यहां अपना कुछ भी नही है
और हाँ...
यादो के मामले में तो ये बिल्कुल ही गरीब है
यहाँ न तो कोई अपना है ,न ही करीब है
अश्क़ शहर के सपने तो आते है
पर वो भी धुंधले है
वो हंसी चेहरे जिनकी आंखों में अश्क़ थे
मेरे शहर छोड़ते वक्त
वो मुरझाये है या खिले है
कुछ पता नही है।
छोड़कर सब चल दिया
अपने अश्क़ शहर को
अपनी यादों को गले लगाने
दोस्तो को लतीफे सुनाने
अपनो के साथ जीने
सपनो के धुंधले चेहरो को जानने
शहर मकां गली
दरवाजे पे खड़ी गोरी
सपनो के धुंधले चिन्ह मिटने लगे
सब साफ नजर आ गया
लगता है मेरा अश्क़ शहर आ गया।
~~~अशोक सिंह'अश्क़
मंगलवार, 21 नवंबर 2017
मैं ,तुम ,चाँद और बदली
ऐ !बिन मौसम की बदली।
तुझे किसकी तड़प,
तू क्यों उतावली।
ना अभी आषाढ़ ना सावन
तू क्यों आसमां मे आ निकली।
दो दिन से चांद नही निकला
ना मेरे बड़े से आंगन में चांदनी फैली।
शाख से जुड़े पत्ते खामोश है
सूखे पत्तो से भी सरसराहट नही निकली।
अब तो तू चली जा
अपनी पूर्णिमा की स्याह लेके।
दो दिन से सिसकियाँ भर रहा है
मेरा महबूब (चांद) आह लेके।
मुझे छत पे बुलाना है चांद को,
गुफ्तगू के लिए
अब तो आ जाने दे उसे प्यार लेके।
कल मत आना अब बदली
चुनना कोई नई राह ,नई मंज़िल
मुझे भी जाना है पिया की गली
तू भी जा बादल संग
खिलने दे मेरे जहन में
एक ताज़ी नई कली।
तू भी हो जाएगी खुश
मैं भी रहूंगीअच्छी भली।
अब तू बादल संग जा उपवन में बरस
मैं भी साजन की बाहों के घेरे में चली।
ऐ !बिन मौसम की बदली
तुझे किसकी तड़प
तू क्यों उतावली।
बता !तू क्यों उतावली।
~~~~अशोक सिंह'अश्क़'
बुधवार, 15 नवंबर 2017
ग़ज़ल ~0.25
ग़ज़ल ~0.25
देखा आज तुम्हे ,पारंपरिक परिधानों से इतर
क्या गजब लगती हो ,क्या कमाल दिखती हो।
हया भी है नज़ाकत भी है और शोखियां भी है तुम मे
फिर जाने क्यों हाथ मे रुमाल रखती हो।
सुना है पूरा कस्बा है दीवाना तेरा
सो हमने हाथ मे गुलाब रक्खा ,पर तुम कटार रखती हो।
अक़ीदा नही है तुम्हे मोहब्बत की वस्ल पर
फिर भी अपने पास तुम मोहब्बत की किताब रखती हो।
तुम्हारे लिए मोहब्बत के क्या मायने है ,नही पता
पता है पर ,तुम किताबों में सूखे गुलाब रखती हो।
मौसम है दीदार करने का, पर करूँ तो करूँ कैसे...
सावन में भी ,तुम मुँह में नकाब रखती हो।
मिस्मार हुआ जा रहा है यहां हर अर्दली
फिर भी तुम अधरों पर मुस्कान लाज़वाब रखती हो।
गालो तक बह आये है आंखों से अश्क़ उनके
तुम्हारा क्या...तुम तो फिर भी एक रकीब रखती हो।
अक़ीदा नही है तुम्हे वस्ल पर
फिर भी अपने पास तुम मोहब्बत की किताब रखती हो।
~~~अशोक सिंह 'अश्क़'
शब्दार्थ
हया -शर्म
नज़ाकत -सुकुमारता
अक़ीदा -विस्वास
वस्ल -मिलन
अर्दली -पहुचाने वाला /प्रेषक
रक़ीब -एक प्रेमी होने के बावज़ूद दूसरा प्रेमी रखना नज़ाकत -सुकुमारता
अक़ीदा -विस्वास
वस्ल -मिलन
अर्दली -पहुचाने वाला /प्रेषक
रविवार, 12 नवंबर 2017
यादे...
यादे कितनी अजीब होती है ना,
बिना कुछ कहे
बिना बताए यादे...
यकायक दस्तक दे जाती है
ये भी नही सोचती
मुल्तजी ...
क्या कर रहा है
क्या सोच रहा है
किस स्तिथि में है
बस आ जाती है
एक बेहया की तरह।
यादे...
पहली नज़र की गोरी की तरह
खूबसूरती भी होती है
और कड़ाही की कालिख की तरह बदसूरत भी।
यादे...
आंसू लाने में भी नहीं चूकती
कभी आंख में किरकिरी की तरह
असहनीय होती है,
तो कभी आंख के कोने
के दो बून्द पोछने के लिए लालयित।
यादो के सहारे
कभी खिलखिलाकर मानुष
हंसता है।
तो कभी फफक कर
रो देता है।
कभी सोचता है कि यादो का
सिलसिला कभी खत्म न हो
और कभी यादो के आ जाने पर
उनको कोसता है।
यादो के सहारे ही
एक बार फिर बचपन मे
दोस्तो के साथ
बरसात में नाव चला लेता है
आम के पेड़ से गिरकर फिर से
दौड़ के दोस्तो के साथ
हांथ पकड़कर
झूम के बचपन का कोई
गीत गुनगुनाने लग जाता है।
यादें...
कभी,
जवानी की हरकतों को
यादकर
यादकर
प्रेयसी की मुस्कान पर
मुस्काने लगता है
तो कभी
राधेय जैसे दोस्तो को याद कर के
मुस्कुराता है
तो कभी न सुधारी गयी /जाने वाली
गलतियों में अंशुओ से
गालो को भिगोता रह जाता है।
यादें
मेरी अतीत की थाती
मेरी यादे...
तुम मेरा कभी साथ न छोड़ना
हमेशा मुस्कान बिखेरने
आंसुओ से चेहरा धोने
बिन बताये एक अतिथि की तरह
हमेशा आती रहना ।
मैं...
तुम्हारे स्वागत के इंतज़ार में
स्वागत के लिए
हमेशा की तरह मिलूंगा
मुस्कुराते हुए
या मयूशी लिए
पर मिलूंगा हमेशा
तेरे इंतज़ार में
तेरे स्वगात के लिए|
~~~अशोक सिंह'अश्क़'
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हमेशा देर कर देता हूँ
हमेशा देर कर देता हूँ मैं ज़रूरी बात कहनी हो कोई वादा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो...
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मैं पीडा का राज कुंवर हूँ, तुम शहजादी रूपनगर की, हो भी गया प्रेम हममें तो बोलो, मिलन कहाँ पर होगा | मेरा कुरता सिला दुखों ने, बदना...
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नज़्म ~दोस्ती जब पता चला कि तुम्हारी मोहब्बत हमे तोड़ने के लिए थी तो आंखों के कोने से अश्क़ की दो बूंदे लुढ़क आ...
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सुनो... क्या तुम ठीक हो ? सच सच बताओ... लगता तो नही कि तुम ठीक है, लगता तो ऐसा है जैसे कुछ कहना चाहती हो। लेकिन कह नही...






