यादे कितनी अजीब होती है ना,
बिना कुछ कहे
बिना बताए यादे...
यकायक दस्तक दे जाती है
ये भी नही सोचती
मुल्तजी ...
क्या कर रहा है
क्या सोच रहा है
किस स्तिथि में है
बस आ जाती है
एक बेहया की तरह।
यादे...
पहली नज़र की गोरी की तरह
खूबसूरती भी होती है
और कड़ाही की कालिख की तरह बदसूरत भी।
यादे...
आंसू लाने में भी नहीं चूकती
कभी आंख में किरकिरी की तरह
असहनीय होती है,
तो कभी आंख के कोने
के दो बून्द पोछने के लिए लालयित।
यादो के सहारे
कभी खिलखिलाकर मानुष
हंसता है।
तो कभी फफक कर
रो देता है।
कभी सोचता है कि यादो का
सिलसिला कभी खत्म न हो
और कभी यादो के आ जाने पर
उनको कोसता है।
यादो के सहारे ही
एक बार फिर बचपन मे
दोस्तो के साथ
बरसात में नाव चला लेता है
आम के पेड़ से गिरकर फिर से
दौड़ के दोस्तो के साथ
हांथ पकड़कर
झूम के बचपन का कोई
गीत गुनगुनाने लग जाता है।
यादें...
कभी,
जवानी की हरकतों को
यादकर
यादकर
प्रेयसी की मुस्कान पर
मुस्काने लगता है
तो कभी
राधेय जैसे दोस्तो को याद कर के
मुस्कुराता है
तो कभी न सुधारी गयी /जाने वाली
गलतियों में अंशुओ से
गालो को भिगोता रह जाता है।
यादें
मेरी अतीत की थाती
मेरी यादे...
तुम मेरा कभी साथ न छोड़ना
हमेशा मुस्कान बिखेरने
आंसुओ से चेहरा धोने
बिन बताये एक अतिथि की तरह
हमेशा आती रहना ।
मैं...
तुम्हारे स्वागत के इंतज़ार में
स्वागत के लिए
हमेशा की तरह मिलूंगा
मुस्कुराते हुए
या मयूशी लिए
पर मिलूंगा हमेशा
तेरे इंतज़ार में
तेरे स्वगात के लिए|
~~~अशोक सिंह'अश्क़'

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