ग़म-ऐ-बहार में वो ...हंसता हुआ चेहरा हमारा है।
तुम्हे फ़िक्र हो हमारी ,ये हक़ हमारा है।
बस एक ही चीज़ है जो हम में भी है और तुम में भी,
जो चांद तुम्हारा है वो ही चांद हमारा है।
कहते है तुम्हे पाकर ,मुरझाये चेहरे भी खिलखिला उठते है
इस तन्हा जहां में ...क्या रुआब तुम्हारा है।
उर्यानी को न कहो इश्क़ मेरे यारो
तुम तोड़के दिल,दिल मे रहो, यही तो इश्क़ हमारा है।
जिनके पीछे सारा का सारा शहर दीवाना है
हम कहते फिरते है वो दीवाना हमारा है।
फरागात भी नही, मुसलसल चली आती हो हर घड़ी
आवाज भी नही एहतराम भी नही, क्या अंदाज़ तुम्हारा है।
तुमने नामंज़ूर कर दी...उनकी पाक मोहब्बत
मुस्कुराना ,बालो में उंगली घुमाना,ये इश्क़ का क्या नजारा है।
इश्क़ करना आसान ,निभाने की तोहमत नही है हम में
दोस्ती में रहो...क्योंकि दोस्ती ही जहां हमारा है।
~~~अशोक सिंह'अश्क़'
शब्दार्थ=
उरयानी -नग्नता
फरागात-फुर्सत
मुसलसल-लगातार

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