तुझे अपने पास रक्खा है
खत लिखे, चिठ्ठियां लिखी,कुछ भेज दिए..कुछ को पास रक्खा है।
ये सिर्फ खत नही,इनमे यादो के जल को सुलझा के रक्खा है।
इनमे रूप -रंग -अक्स-नक्श सब का सब वैसा है
जैसा तुमने अपने पास रक्खा है।
कहा था लाऊंगा ...चांद तारे चांदनी जुगुनू गगन से
देख आज सबको छाजन पे बुला के रक्खा है।
हवा तेरी जुल्फों से,धूप तेरे चेहरे से ...खेल रही है
सिर्फ हमे... तुमने ,चुपचाप बिठा के रक्खा है।
इस दीवाने शहर में,तू इश्क़ है हर किसी का
हमने अपनी मोहब्बत को शहर से छुपा के रक्खा है।
सूरज चांद तारे और ये शमा सब के सब तेरे दीवाने बन बैठे
तेरी झलक की खातिर इन्होंने पहरा लगा के रक्खा है।
देख के इनकी मोहब्बत ,तेरे लिए
इश्क़ -ऐ-बयां को शौक -ऐ-जहां में दबा के रक्खा है।
~~~अशोक सिंह'अश्क़'
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