ऐ !बिन मौसम की बदली।
तुझे किसकी तड़प,
तू क्यों उतावली।
ना अभी आषाढ़ ना सावन
तू क्यों आसमां मे आ निकली।
दो दिन से चांद नही निकला
ना मेरे बड़े से आंगन में चांदनी फैली।
शाख से जुड़े पत्ते खामोश है
सूखे पत्तो से भी सरसराहट नही निकली।
अब तो तू चली जा
अपनी पूर्णिमा की स्याह लेके।
दो दिन से सिसकियाँ भर रहा है
मेरा महबूब (चांद) आह लेके।
मुझे छत पे बुलाना है चांद को,
गुफ्तगू के लिए
अब तो आ जाने दे उसे प्यार लेके।
कल मत आना अब बदली
चुनना कोई नई राह ,नई मंज़िल
मुझे भी जाना है पिया की गली
तू भी जा बादल संग
खिलने दे मेरे जहन में
एक ताज़ी नई कली।
तू भी हो जाएगी खुश
मैं भी रहूंगीअच्छी भली।
अब तू बादल संग जा उपवन में बरस
मैं भी साजन की बाहों के घेरे में चली।
ऐ !बिन मौसम की बदली
तुझे किसकी तड़प
तू क्यों उतावली।
बता !तू क्यों उतावली।
~~~~अशोक सिंह'अश्क़'

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