निराला के शहर में
हर बार दूर जाके भी , लौट आता हूँ मैं, निराला के शहर में।
सिमट जाता हूँ मैं, कुछ बात तो है, निराला के शहर में।
कभी पत्थर तोड़ती उस निसहाय को, कभी मोहब्बत को ,
तो कभी सपनो के लिये उड़ाने भरता हूं , निराला के शहर में।
कभी भूलाकर सब ,उस बड़ी काजल आंखों वाली गोरी को ताडता हूं,
कभी उसके न दिखने का शकेब भी छिन जाता है ,निराला के शहर में।
रोना भी हुआ ,मुस्कुराना भी हुआ, खुशी का ठिकाना भी मिला,
मोहब्बत भी हुई, बिछड़ना भी हुआ ,निराला के शहर में।
कभी उसकी (दोस्तो )की रिफाकत में मुस्कुराता हूं, तो कभी आंखों के कोनो को बस पोछ पाता हूं,
इस अजीब सी कश्मकश में हंसी खोज लेता हूँ, निराला के शहर में।
ये शहर कैसा बन गया है, कभी लोग हालचाल भी नही पूछते,
कभी झुक के सलाम ठोक जाते है, निराला के शहर में।
सूरत क्या गज़ब निकली, वो खुद को मोहज्जब समझ बैठे
सच ये है कि उनको एहतिराम नही है बड़ो का, निराला के शहर में।
कुछ अलग रंग , कुछ अलग स्वाद है ,नज़ाकत भी अलग है
तभी तो हर बार खींचे चले आते है, निराला के शहर में।
~~~अशोक सिंह'अश्क़'
शकेब-धैर्य
रिफाकत-साथ
मोहज्जब-सभ्य
एहतिराम-आदर