सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

ईश्वर और शांति

     ईश्वर और शांति 




     मैं और तुम
     अमूमन हम सब
     ईर्ष्या और इच्छाओं में लिप्त
     देखो
     उन कुछ शांत और स्थिर संतो को
     चेहरे में संतोष और सुकून की लकीरें
     दृढ़ है जो अपने विश्वास पर
     अडिग है अपनी आस्थाओ पर
     चले आ रहे हज़ारो
     दुःखी और व्याकुल मन
     जिनके पास
     ईश्वर और शांति को खोज में।
     ~~~अशोक सिंह'अश्क़'

रविवार, 29 अक्टूबर 2017

अश्क़ शहर का चांद


  •  अश्क़ शहर का चांद


सब कुछ छोड़कर
अपनो को,दोस्तो को
छोड़कर अपने अश्क़ शहर को
पहुँचा जब अनजान शहर को
अब मेरे साथ न कोई अपना है
न अपनापन
यादे है जो भुलाये नही भूलती
सबकुछ सुनसान सा है
और है अहसास का खालीपन
अपनो को यादों बुलाकर
यादो संग
चांदनी रात में छत पर
यादो को और अपनो को बिखेरता हूँ बातो के लिए तेरी ओर निहारता हूँ
तुझसे खुलकर बाते करता हूँ
हर एक बात पर तेरे साथ मुस्कुरता हूँ
काश !हर पल तू मेरे साथ होता 
चांदनी रात की तरह खुशनुमा दिन में भी 
क्योंकि तू ही है
जो मेरे संग चला आया
वैसी ही स्थिति में
जैसा मुझसे मिलता था
अश्क़ शहर में।
~~~अशोक सिंह'अश्क़'

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

निराला के शहर में

                       

                                  निराला के शहर में




हर बार दूर जाके भी , लौट आता हूँ मैं, निराला के शहर में।

सिमट जाता हूँ मैं, कुछ बात तो है, निराला के शहर में।


कभी पत्थर तोड़ती उस निसहाय को, कभी मोहब्बत को ,

तो कभी सपनो के लिये उड़ाने भरता हूं , निराला के शहर में।


कभी भूलाकर सब ,उस बड़ी काजल आंखों वाली गोरी को ताडता हूं,

कभी उसके न दिखने का शकेब भी छिन जाता है ,निराला के शहर में।


रोना भी हुआ ,मुस्कुराना भी हुआ, खुशी का ठिकाना भी मिला,

मोहब्बत भी हुई, बिछड़ना भी हुआ ,निराला के शहर में।


कभी उसकी (दोस्तो )की रिफाकत में मुस्कुराता हूं, तो कभी आंखों के कोनो को बस पोछ पाता हूं,

इस अजीब सी कश्मकश में हंसी खोज लेता हूँ, निराला के शहर में।


ये शहर कैसा बन गया है, कभी लोग हालचाल भी नही पूछते,

कभी झुक के सलाम ठोक जाते है, निराला के शहर में।


सूरत क्या गज़ब निकली, वो खुद को मोहज्जब समझ बैठे

सच ये है कि उनको एहतिराम नही है बड़ो का, निराला के शहर में।

 

कुछ अलग रंग , कुछ अलग स्वाद है ,नज़ाकत भी अलग है

तभी तो हर बार खींचे चले आते है, निराला के शहर में।



~~~अशोक सिंह'अश्क़'



शकेब-धैर्य

रिफाकत-साथ

मोहज्जब-सभ्य

एहतिराम-आदर

हमेशा देर कर देता हूँ

हमेशा देर कर देता हूँ मैं ज़रूरी बात कहनी हो कोई वादा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं   मदद करनी हो...