रविवार, 29 अक्टूबर 2017

अश्क़ शहर का चांद


  •  अश्क़ शहर का चांद


सब कुछ छोड़कर
अपनो को,दोस्तो को
छोड़कर अपने अश्क़ शहर को
पहुँचा जब अनजान शहर को
अब मेरे साथ न कोई अपना है
न अपनापन
यादे है जो भुलाये नही भूलती
सबकुछ सुनसान सा है
और है अहसास का खालीपन
अपनो को यादों बुलाकर
यादो संग
चांदनी रात में छत पर
यादो को और अपनो को बिखेरता हूँ बातो के लिए तेरी ओर निहारता हूँ
तुझसे खुलकर बाते करता हूँ
हर एक बात पर तेरे साथ मुस्कुरता हूँ
काश !हर पल तू मेरे साथ होता 
चांदनी रात की तरह खुशनुमा दिन में भी 
क्योंकि तू ही है
जो मेरे संग चला आया
वैसी ही स्थिति में
जैसा मुझसे मिलता था
अश्क़ शहर में।
~~~अशोक सिंह'अश्क़'

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