ये अनजान शहर भी कितना अजीब है
यहां अपना कुछ भी नही है
और हाँ...
यादो के मामले में तो ये बिल्कुल ही गरीब है
यहाँ न तो कोई अपना है ,न ही करीब है
अश्क़ शहर के सपने तो आते है
पर वो भी धुंधले है
वो हंसी चेहरे जिनकी आंखों में अश्क़ थे
मेरे शहर छोड़ते वक्त
वो मुरझाये है या खिले है
कुछ पता नही है।
छोड़कर सब चल दिया
अपने अश्क़ शहर को
अपनी यादों को गले लगाने
दोस्तो को लतीफे सुनाने
अपनो के साथ जीने
सपनो के धुंधले चेहरो को जानने
शहर मकां गली
दरवाजे पे खड़ी गोरी
सपनो के धुंधले चिन्ह मिटने लगे
सब साफ नजर आ गया
लगता है मेरा अश्क़ शहर आ गया।
~~~अशोक सिंह'अश्क़

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