खेला हूं यहां मै, तितलियों (भौरों/फूलो) के संग।
झगड़े भी हुए है, शूलो फूलो के संग।
फिर भी सब भूलाकर गले मिल रहे है हम
आम और बबूलों के संग।
अपनो के बिना ज़िन्दगी वीरान सी लगती है
ये मैने सिख लिया शहर से दूर ,रहकर गुलो के संग।
लौट के आया हूँ अपनी ज़िंदगी के पास
छोड़के अपने अहम को, अपने वसूलों के संग।
फिर जमेगी महफ़िल चबूतरे में , बाग़ बगीचों में
फिर होगी संग मस्ती ,सावन में झूलो के संग।
अब नही होगे अकेले ,सुनसान रास्तो में भी
दोस्तो को साथ लेके, दो-दो हांथ करके अब मंज़िलो के संग।
~~~अशोक सिंह 'अश्क़'

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