ग़ज़ल ~0.25
देखा आज तुम्हे ,पारंपरिक परिधानों से इतर
क्या गजब लगती हो ,क्या कमाल दिखती हो।
हया भी है नज़ाकत भी है और शोखियां भी है तुम मे
फिर जाने क्यों हाथ मे रुमाल रखती हो।
सुना है पूरा कस्बा है दीवाना तेरा
सो हमने हाथ मे गुलाब रक्खा ,पर तुम कटार रखती हो।
अक़ीदा नही है तुम्हे मोहब्बत की वस्ल पर
फिर भी अपने पास तुम मोहब्बत की किताब रखती हो।
तुम्हारे लिए मोहब्बत के क्या मायने है ,नही पता
पता है पर ,तुम किताबों में सूखे गुलाब रखती हो।
मौसम है दीदार करने का, पर करूँ तो करूँ कैसे...
सावन में भी ,तुम मुँह में नकाब रखती हो।
मिस्मार हुआ जा रहा है यहां हर अर्दली
फिर भी तुम अधरों पर मुस्कान लाज़वाब रखती हो।
गालो तक बह आये है आंखों से अश्क़ उनके
तुम्हारा क्या...तुम तो फिर भी एक रकीब रखती हो।
अक़ीदा नही है तुम्हे वस्ल पर
फिर भी अपने पास तुम मोहब्बत की किताब रखती हो।
~~~अशोक सिंह 'अश्क़'
शब्दार्थ
हया -शर्म
नज़ाकत -सुकुमारता
अक़ीदा -विस्वास
वस्ल -मिलन
अर्दली -पहुचाने वाला /प्रेषक
रक़ीब -एक प्रेमी होने के बावज़ूद दूसरा प्रेमी रखना नज़ाकत -सुकुमारता
अक़ीदा -विस्वास
वस्ल -मिलन
अर्दली -पहुचाने वाला /प्रेषक

बहुत खूब....
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